
मुंबई: मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस CM Devendra Fadnavis द्वारा प्रस्तुत राज्य का बजट केवल बड़े-बड़े आंकड़ों और खोखले ऐलानों से भरा हुआ है। सरकार ने राज्य पर कर्ज का पहाड़ खड़ा कर दिया है और लगभग 40 हजार करोड़ रुपये के घाटे वाला यह बजट महाराष्ट्र को दिवालियेपन की ओर ले जाने वाला है। बजट में बुलेट ट्रेन, मेट्रो और भूमिगत मार्गों का ही बोलबाला है, जबकि गांवों में रहने वाले गरीब, आदिवासी, मेहनतकश, महिलाएं, बेरोजगार और युवाओं के लिए इसमें कोई स्थान नहीं है। कुल मिलाकर यह बजट कुछ शहरों और कुछ चुनिंदा लोगों के लिए ही बनाया गया है। आम जनता को इससे कोई लाभ नहीं मिलने वाला है, ऐसी प्रतिक्रिया महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल Harshwardhan Sapkal ने दी है।
बजट पर बोलते हुए हर्षवर्धन सपकाल ने कहा कि ‘विकसित महाराष्ट्र 2047’ की कल्पना और 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सपना केवल दिवास्वप्न है। पिछले कुछ वर्षों से भाजपा गठबंधन सरकार बजट में बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन बाद में हर विधानसभा सत्र में करोड़ों रुपये की पूरक मांगें पेश करनी पड़ती हैं। आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि राज्य की आर्थिक स्थिति लगातार खराब हो रही है।
राज्य पर कर्ज और कर्ज की गारंटी मिलाकर लगभग 12 लाख करोड़ रुपये का बोझ हो चुका है। केवल कर्ज की किस्त चुकाने के लिए ही हर साल 65 हजार करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे साफ है कि बजट के आंकड़ों और जमीन पर वास्तविक स्थिति के बीच बहुत बड़ा अंतर है।
पिछले बजट में अनुसूचित जाति की योजनाओं के लिए 22 हजार 658 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, लेकिन वास्तव में केवल 6 हजार 200 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए। पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के लिए भी बजट में बड़े-बड़े आंकड़े घोषित किए जाते हैं, लेकिन वास्तविक खर्च नहीं किया जाता।
सपकाल ने आगे कहा कि राज्य के सामने सबसे बड़ा संकट बेरोजगारी का है, लेकिन बजट में केवल 75 हजार सरकारी नौकरियों की भर्ती की घोषणा की गई है। भाजपा सरकार के पिछले “मेगा भर्ती” के अनुभव को देखते हुए यह घोषणा भी केवल एक और खोखा वादा लगती है। ‘लाडकी बहिन’ योजना बंद नहीं होगी ऐसा कहा गया है, लेकिन 2100 करोड़ रुपये देने का वादा अभी तक हवा में ही है, जिससे साफ है कि सरकार ने महिलाओं को एक बार फिर धोखा दिया है।
सरकार ने कर्जमाफी की घोषणा की है, लेकिन पहले घोषित कर्जमाफी योजना के तहत लाखों किसान आज भी लाभ से वंचित हैं। इसलिए नई कर्जमाफी की घोषणा किसानों के साथ एक और छल साबित न हो, यह चिंता का विषय है। सरकार का रवैया ऐसा है कि “झूठे निमंत्रण की तरह, जब तक भोजन न मिले तब तक विश्वास नहीं होता।”
कृषि और किसानों के लिए कुछ घोषणाएं की गई हैं, लेकिन अमेरिका के साथ किए गए व्यापार समझौते के बाद भारतीय किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य मिलना और कठिन हो सकता है। किसानों की आय बढ़ने के बजाय घटने का खतरा अधिक है। किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए बजट में घोषित उपाय भी पर्याप्त नहीं हैं।
पिछले वर्ष अच्छी बारिश होने के बावजूद राज्य का सिंचित क्षेत्र 56 लाख हेक्टेयर से घटकर 39 लाख हेक्टेयर तक आ गया है। साथ ही खेती योग्य क्षेत्र में भी कमी आई है। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार ने किसानों को पूरी तरह से उनके हाल पर छोड़ दिया है।
तीसरी मुंबई, चौथी मुंबई, शक्तिपीठ महामार्ग और वाढवण बंदरगाह जैसे प्रकल्प अडानी और अंबानी जैसे बड़े उद्योग समूहों के हित में बनाए जा रहे हैं, जिनसे आम जनता को कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिलेगा।
सरकार की सौर ऊर्जा नीति भी भ्रामक है। इससे बिजली उपभोक्ताओं को राहत नहीं बल्कि प्रति यूनिट 26 पैसे का अतिरिक्त भार पड़ने वाला है। स्मार्ट मीटर के कारण पहले ही बिजली बिलों में भारी वृद्धि हो चुकी है।
सरकार ने दावा किया था कि दावोस सम्मेलन में 2022 से 2025 के बीच 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश समझौते हुए हैं, लेकिन आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार राज्य में वास्तव में केवल 6 लाख करोड़ रुपये का ही निवेश आया है। इससे साफ है कि सरकार के दावे और वास्तविकता के बीच भारी अंतर है, ऐसा हर्षवर्धन सपकाल ने कहा।





























































































































































































