
मुंबई:अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच हुए युद्ध के बाद विश्व की भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ पूरी तरह बदलने वाली हैं। दुनिया अब केवल दो महाशक्तियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बहुध्रुवीय व्यवस्था (मल्टीपोलर वर्ल्ड) में प्रवेश कर चुकी है और इसकी शुरुआत वर्ष 2013 से ही हो चुकी थी। अमेरिका ने द्वितीय विश्वयुद्ध और शीत युद्ध अवश्य जीता, लेकिन आज विश्व व्यवस्था पूरी तरह बदल चुकी है। रूस, चीन के साथ-साथ अन्य शक्तियाँ भी उभर चुकी हैं। इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में एशिया में पाकिस्तान का महत्व बढ़ा है, जो भारत के लिए शुभ संकेत नहीं है। भारत की विदेश नीति दुनिया के बदलते समीकरणों को समझने में विफल रही है और यह भारत के लिए चिंताजनक स्थिति है। यह बात रक्षा एवं युद्धनीति विषय के अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक प्रवीण साहनी Praveen Sahni ने कही।
महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा “अमेरिका–ईरान युद्ध और भारत पर उसके प्रभाव” विषय पर तिलक भवन में विशेष परिसंवाद का आयोजन किया गया था। इस परिसंवाद के मुख्य वक्ता रक्षा एवं युद्धनीति विषय के अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक प्रवीण साहनी थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने की। इस अवसर पर पूर्व सांसद कुमार केतकर, हुसैन दलवाई, सामाजिक कार्यकर्ता फिरोज मिठीबोरवाला सहित अनेक गणमान्य उपस्थित थे।
इस अवसर पर प्रवीण साहनी ने कहा कि अमेरिका–ईरान युद्ध में अमेरिका को भारी नुकसान हुआ है। ईरान के पीछे रूस और चीन की ताकत खड़ी है। इन दोनों देशों ने ईरान को तकनीक सहित हर प्रकार की सहायता प्रदान की है। मिसाइल क्षमता ईरान की सबसे बड़ी ताकत है और उसकी भौगोलिक स्थिति भी उसके पक्ष में है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य इस पूरे संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है, जिस पर ईरान का नियंत्रण है। इसी मार्ग से दुनिया का बड़ा हिस्सा व्यापार और तेल परिवहन करता है तथा विश्व के लगभग 30 प्रतिशत इंटरनेट नेटवर्क का आवागमन भी इसी क्षेत्र से होता है। अमेरिका के 80 देशों में सैन्य अड्डे हैं, जिन पर प्रतिवर्ष लगभग एक ट्रिलियन डॉलर का खर्च होता है। कतर, दुबई और सऊदी अरब में अमेरिका की बड़ी सैन्य उपस्थिति है, जिसे ईरान ने निशाना बनाया है। ईरान युद्ध के बाद अमेरिका का आर्थिक और सैन्य साम्राज्य गंभीर संकट में पड़ सकता है।
प्रवीण साहनी ने आगे कहा कि वर्ष 2013 के बाद दुनिया बहुध्रुवीय हो चुकी है। इसके बाद नरेंद्र मोदी सत्ता में आए, लेकिन वे अब भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि दुनिया बदल चुकी है। पाकिस्तान आज वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण शक्ति बन गया है। हम ऑपरेशन सिंदूर की जीत के दावे कर रहे हैं, जबकि अमेरिका का कहना है कि इस युद्ध में पाकिस्तान का प्रदर्शन बेहतर रहा। पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिसके अमेरिका, रूस और चीन—तीनों महाशक्तियों से अच्छे संबंध हैं। पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया दोनों क्षेत्रों में पाकिस्तान का महत्व बढ़ गया है। अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान ने मध्यस्थता की, लेकिन भारत में इसे “दलाली” कहकर खारिज किया गया, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति में अनेक कमियाँ हैं और हम वास्तविकताओं को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। दुनिया के नए भू-राजनीतिक समीकरणों को भारत अब तक स्वीकार नहीं कर पाया है। भारत एक बड़ा देश है और उसे दक्षिण एशिया की प्रमुख शक्ति बनना चाहिए। रूस के साथ भारत की मित्रता अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन हम लगातार अमेरिका की ओर झुकते जा रहे हैं। अमेरिका का राष्ट्रपति सार्वजनिक रूप से भारत के प्रधानमंत्री का अपमान करता है और भारत चुप रहता है। यदि भारत ने समय रहते अवसरों को पहचानकर अपनी विदेश नीति में बदलाव नहीं किया, तो यह देश के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकता है। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई अमेरिका और इज़राइल के हमले में मारे गए, लेकिन भारत की ओर से न तो शोक व्यक्त किया गया और न ही संवेदना संदेश जारी किया गया। भारत और ईरान के संबंध आज भी दोनों देशों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक रिश्तों के कारण मजबूत हैं, न कि वर्तमान मोदी सरकार की वजह से।





























































































































































































