BJP leaders splurge Rs 100 crore on lavish garba events as farmers reel under drought: Atul Londhe
BJP leaders splurge Rs 100 crore on lavish garba events as farmers reel under drought: Atul Londhe

मुंबई/नागपुर:महाराष्ट्र में वर्ष 1972 से भी भयंकर सूखे की स्थिति पैदा हो गई है। राज्य के 305 तालुका इस सूखे की चपेट में हैं। किसान और आम जनता भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। एक तरफ महंगाई है, तो दूसरी तरफ पीने के पानी की कमी, पशुओं के लिए चारे का अभाव और विद्यार्थियों की शैक्षणिक फीस भरने तक के लिए पैसे नहीं हैं। दशहरा और दिवाली जैसे त्योहार नजदीक होने के बावजूद लोगों के हाथों में त्योहार मनाने के लिए पैसा नहीं है। ऐसी भयावह स्थिति में सत्ताधारी भाजपा के नेता भव्य आयोजनों के नाम पर करीब 100 करोड़ रुपये की फिजूलखर्ची कर रहे हैं। यह गंभीर आरोप लगाते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता अतुल लोंढे ने सवाल किया कि क्या मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस में ऐसे असंवेदनशील नेताओं से इस्तीफा लेने का साहस है?

नागपुर में पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए अतुल लोंढे ने कहा कि फिलहाल नवरात्रि उत्सव चल रहा है और देवी की आराधना की जा रही है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए त्योहार सादगी से भी मनाया जा सकता है। एक ओर सरकार जनता से खर्चों में कटौती करने की अपील करती है, वहीं दूसरी ओर भाजपा के नेता उत्सवों के नाम पर गरबा आयोजित करके करोड़ों रुपये लुटा रहे हैं।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण, मंत्री आशीष शेलार, विधायक अतुल भातखलकर, पूर्व सांसद गोपाल शेट्टी, विधायक संजय उपाध्याय और विधायक विनोद शेलार ने गरबा आयोजनों पर भारी खर्च किया है। यह सूखे से त्रस्त किसानों के साथ क्रूर मजाक करने और उनके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा कृत्य है।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने डोंबिवली में ‘नमो नमो नवरात्रि उत्सव’ का आयोजन किया है। संत सावळाराम महाराज क्रीड़ा संकुल में गरबा आयोजन के लिए एक विशाल वातानुकूलित मंडप बनाया गया है। मंडप में बड़े-बड़े झूमर लगाए गए हैं और भव्य विद्युत रोशनी की गई है। इस पर लाखों रुपये खर्च किए गए हैं। विशाल स्वागत द्वार, एलईडी स्क्रीन और एलईडी लाइटों की चकाचौंध की गई है।

इस आयोजन में प्रतिदिन 10 से 15 हजार लोग शामिल होते हैं। इसके लिए 7,000 वर्ग फुट का इनडोर प्लेटफॉर्म और 20,000 वर्ग फुट का आउटडोर प्लेटफॉर्म बनाया गया है, जिस पर 60 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। मंडप में 2,000 टन क्षमता के एसी लगाए गए हैं, जिनका किराया प्रतिदिन 60 लाख रुपये बताया गया है। साउंड और लाइटिंग पर प्रतिदिन 25 लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं। मंडप के लिए 25 जनरेटर सेट लगाए गए हैं, जिनका प्रतिदिन का किराया 6.5 लाख रुपये है।

गुजराती लोकसंगीत के प्रसिद्ध गायकों और नृत्य कलाकारों को करोड़ों रुपये देकर बुलाया गया है। प्रसिद्ध गायक नीलेश गढ़वी नवरात्रि के दौरान एक से दो करोड़ रुपये तक का शुल्क लेते हैं। कविता राम, सागर केंडूरकर, माधवी श्रीवास्तव और अंशिका चोणकर जैसे प्रसिद्ध गायक भी अपनी प्रस्तुतियां दे रहे हैं। इन कलाकारों की एक दिन की फीस दो से पांच लाख रुपये बताई जा रही है।

गायकों के साथ प्रसिद्ध सिम्फनी बैंड भी मौजूद है। संगीत और गायकों पर कुल चार से पांच करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। मंडप में विभिन्न प्रकार के फूलों की सजावट पर आयोजकों की ओर से प्रतिदिन तीन से पांच लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं। रवींद्र चव्हाण के इस आयोजन पर प्रतिदिन एक से डेढ़ करोड़ रुपये खर्च किए जाने और कुल बजट 18 से 20 करोड़ रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है।

केवल रवींद्र चव्हाण ही नहीं, बल्कि भाजपा के मंत्री आशीष शेलार और विधायक अतुल भातखलकर ने भी गरबा आयोजनों का आयोजन किया है, जिन पर प्रतिदिन करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सूखे की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए त्योहारों को सादगी से मनाने की अपील की थी।

लेकिन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण और पार्टी के मंत्री-विधायकों ने ही मुख्यमंत्री की अपील को नजरअंदाज कर दिया है। अतुल लोंढे ने कहा कि सूखाग्रस्त किसानों के लिए मात्र 5,000 रुपये की सहायता घोषित करने वाली सरकार के भाजपा मंत्री और विधायक नवरात्रि एवं गरबा आयोजनों पर प्रतिदिन 10 से 15 करोड़ रुपये की फिजूलखर्ची कर रहे हैं।

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छत्रपति संभाजीनगर के बीड बायपास पर ‘प्रौढ़ प्रताप पुरंदर’ नामक भव्य महानाट्य के स्तंभपूजन समारोह का आयोजन भी बड़े धूमधाम से किया गया। इस अवसर पर पालकमंत्री संजय शिरसाट, मंत्री अतुल सावे, पूर्व मंत्री भागवत कराड सहित कई नेता उपस्थित थे। छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास नई पीढ़ी तक पहुंचना चाहिए,

लेकिन इसके लिए सूखे की स्थिति में करोड़ों रुपये खर्च करके भव्य कार्यक्रम आयोजित करने की क्या आवश्यकता है? मराठवाड़ा में जब सूखे की भीषणता चरम पर है, तब क्या नेताओं में सामाजिक संवेदनशीलता और जनहित के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी नहीं होना चाहिए? यह सवाल उठाया जा रहा है।

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