The government has declared a drought, but when will concrete assistance actually be provided? First, deposit cash aid into farmers' bank accounts, then complete the formalities of damage assessment: Harshvardhan Sapkal.
The government has declared a drought, but when will concrete assistance actually be provided? First, deposit cash aid into farmers' bank accounts, then complete the formalities of damage assessment: Harshvardhan Sapkal.

मुंबई:राज्य के 75 प्रतिशत हिस्से में सरकार ने सूखा घोषित किया है, लेकिन ठोस सहायता के संबंध में अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है। आज के निर्णय में मामूली रियायतों की घोषणा की गई है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और दोनों उपमुख्यमंत्रियों ने सूखा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया है। उन्होंने स्वयं सूखे की भयावहता देखी है। ऐसे में पंचनामा और सर्वे कराने की आवश्यकता ही क्या है? दशहरा-दिवाली जैसे त्योहार सामने हैं। इसे ध्यान में रखते हुए किसानों के बैंक खातों में प्रति हेक्टेयर 1 लाख रुपये जमा किए जाएं और उसके बाद कागजी औपचारिकताएं पूरी की जाएं, यह मांग कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने की है।

सूखे के मुद्दे पर बोलते हुए कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने कहा कि सरकार ने सूखा घोषित कर दिया, लेकिन वास्तविक सहायता कितनी मिलेगी और कब मिलेगी, यह महत्वपूर्ण है। भाजपा सरकार के पिछले अनुभव को देखते हुए कहीं ऐसी स्थिति न हो जाए कि “राजा उदार हुआ, हाथ में कद्दू दे दिया।” सूखे की व्यापकता और किसानों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए मामूली रियायतों के बजाय प्रत्यक्ष और ठोस आर्थिक सहायता की आवश्यकता है।

खरीफ की फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। पशुओं के चारे और पानी की गंभीर समस्या है। अनेक गांवों और बस्तियों में पीने का पानी उपलब्ध नहीं है, वहीं कुछ शहरों में भी पानी की गंभीर स्थिति बनी हुई है। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सरकार को युद्धस्तर पर निर्णय लेने चाहिए। जब पानी ही उपलब्ध नहीं है, तो कृषि बिजली बिल माफी का लाभ किसानों को कैसे मिलेगा? खरीफ तो बर्बाद हो ही चुका है, अब रबी सीजन पर भी बड़ा संकट मंडरा रहा है। इस वर्ष खेती से किसानों के हाथ कुछ भी नहीं लगेगा, ऐसा चित्र दिखाई दे रहा है। ऐसे में परिवार का गुजारा कैसे होगा? बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी? ये सवाल किसानों को परेशान कर रहे हैं।

सरकार को फसल ऋण माफी और रबी सीजन के लिए विशेष आर्थिक सहायता देनी चाहिए। पशुधन को बचाने के लिए पर्याप्त चारा और पशु आहार उपलब्ध कराया जाना चाहिए। विद्यार्थियों के लिए केवल परीक्षा शुल्क माफ करने के बजाय पूरी शैक्षणिक फीस माफ की जाए। साथ ही खेत मजदूरों के लिए स्वतंत्र आर्थिक सहायता का प्रावधान किया जाए। सूखे के दौरान किसानों पर आर्थिक और मानसिक दबाव बढ़ता है। इसलिए स्थिति और गंभीर होने से पहले सरकार को किसानों और खेत मजदूरों को तत्काल मजबूत आर्थिक सहारा देना आवश्यक है। सहायता में देरी से स्थिति और अधिक कठिन हो सकती है।

इस वर्ष का सूखा 1972 से भी अधिक गंभीर है, इसकी जानकारी सरकार को भी है, लेकिन इस संकट का सामना कैसे किया जाए, इसका कोई ठोस नियोजन सरकार के पास दिखाई नहीं देता। 1972 के सूखे के दौरान कांग्रेस सरकार ने रोजगार गारंटी योजना शुरू की थी। इस योजना ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़ी मजबूती दी। शरद पवार मुख्यमंत्री थे, तब खेती के लिए फलोद्यान जैसी योजनाएं शुरू की गईं। महाविकास आघाड़ी सरकार के दौरान तत्काल 10 हजार रुपये की सहायता दी गई और उसके बाद बड़ा पैकेज दिया गया। उसी तरह की कोई ठोस नीति इस सरकार के पास दिखाई नहीं देती।

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सरकार द्वारा सूखा घोषित करते ही सत्ता पक्ष के कुछ बड़बोले मंत्री यह कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री ने विपक्ष के हाथ से मुद्दा ही छीन लिया है और विपक्ष को नकारात्मकता नहीं फैलानी चाहिए। ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयान देते हुए वे मुख्यमंत्री का गुणगान कर रहे हैं। सरकार किसानों को सहायता देती है, तो वह कोई उपकार नहीं है; यह किसानों का अधिकार और सरकार का कर्तव्य है। विपक्ष जनता के सवाल उठाता है। सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का संवैधानिक अधिकार है। इसलिए मंत्रियों को विपक्ष को नसीहत देने के बजाय किसानों के सवालों का जवाब देना चाहिए, ऐसा भी हर्षवर्धन सपकाल ने कहा।

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